कहे जाता हूँ

कुछ अपने ग़म, कुछ वक़्त के सितम, सहे जाता हूँ मैं,
कुछ आप बीती, कुछ जग बीती, कहे जाता हूँ मैं !

देखा जो बूढ़े बाप के कंधे, जवान बेटे की रुक्सत का बोझ,
रह रह कर मिट्टी के मकान की तरह ढहे जाता हूँ मैं !

वो डोली जो चौखट से उठने को है, किसी अपने की नहीं,
फिर भी रह रह कर भावनाओं में बहे जाता हूँ मैं !

जब से एक नूरानी निगाह डाली है उस फ़क़ीर ने मुझ पर,
दिन रात रूहानी मस्ती में लहे जाता हूँ मैं !

विश्रान्ति ऐसी कि साँस लेना भी बोझ लगता हैं अब मुझको,
न रहकर भी इस दुनिया में रहे जाता हूँ मैं !

- आशुतोष चौधरी

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