सरहद

सरहद से हम लौट के, घर आ न पाए!
हाथ में थी बन्दुक, पर चला न पाए !!

वो हम वतन हो के भी, हम पर पत्थर बरसाते रहे ,
हम बेबस इतने, कि उन्हें आँखें भी दिखा न पाए !

वर्दी की लाज बचाने को, हम लात घूंसे भी खाते रहे,
ख़ून खौलता रहा रगों में ,और हम ऊँगली भी उठा न पाए !

क़दम क़दम पर वो छूरा घोपने को पीठ खोजते रहे,
और हम उनकी गोलीओं से, अपना सीना छुपा न पाए !

अचानक जब सामना हुआ दहशतग़र्दों से इस बार,
धड़ें तो सारी काट दी हमने, पर जड़ तक जा न पाए !

अरे सेना को घुसकर लड़ने की अब तो इजाजत दो,
ताकि और कोई नापाक़ आतंकी, फ़िर इस पार न आए !

जा रहा हूँ दुनिया से एक यही प्रार्थना कर,
कि मेरे जाने की खबर, कोई मेरी माँ को न बताए !

जल्द लौट के आऊंगा माँ भारती की गोद में,
ख्याल रहे देशप्रेम का चिराग़, कोई बुझा न पाए !

-आशुतोष

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