शिवरात्रि


हे आशुतोष, मेरे अंतर मन में  आत्म विश्रान्ति भर दे,
हे नीलकंठ, हे महादेव, मुझको तू शिवाला कर दे !


आसमाँ में बैठा कोई गजब खेल खेल रहा है,
भूखे नंगे पेड़ो पे बर्फ के फ़व्वारे उड़ेल रहा है !

क्या हुआ ग़र ये पेड़ पत्तों से भरा न था,
बस पतझड़ का असर था, मरा न था !


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