बिसरत नाहीं


मातु पितु दरस को हृदय अकुलाहीं !
ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं !!

ग्वाल गोप जहँ  माखन खाहीं !
उन सम कहाँ सखा जग माहीं !!

सुर नर मुनि भजन जहँ गाहीं !
गुरु कृपा की जहँ अविरल छाहीं !


ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं !


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