गणतंत्र

परतंत्रता के हाथों कई बार राजतंत्र बिकी है,
स्वतंत्रता की ईमारत शहीदों के शीश पे टिकी हैं!

भ्रस्टाचार, जातिवाद, आरक्षण से देश लुट रहा है ,

स्वतंत्र हैं हम, पर गणतंत्र का दम घुट रहा है!

वतन के रहनुमाओं के पास साज़ है, पर आग़ाज़ नहीं,

देखने को इनके सुनहरे पंख है, पर परवाज़ नहीं!

चोरो की ज़मात इकट्ठी हो गयी इस कदर,

भटकता रह न जाये देश अपना दर-ब-दर!

गली गली, घर घर में अब राष्ट्रगान चाहिए,

लहराते तिरंगे को नया आसमान चाहिए !

-आशुतोष चौधरी 

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